ban on zakir nayak by british govrnment

I had have a very intresting discussion with a muslim named Taufiq Ahmad at orkut, who was supporting Dr. Zakir Nayak and crticising the UK government for the ban and asking  for the support of community members in Dr. Zakir's favour on the ground that it should be seen as the insult of indians. To counter him, i argued that Isalm is a religion of hate, and Zakir nayak preach hate and supports terrorism, so UK government did the right thing by denying the entry to Zakir Nayak in UK. Let's see what were the main points,
Taufiq,
1) He questioned my authenticity over islamic knowledge.
2) Raised doubts over material through which I acquired knowledge about Islam 
3) Then rolled the familiar excuse of translation, so Ishould learn it in Arabic,
4) Then tried to counter attack me by attacking Hinduism,
5) He also raised  doubt over Swami Dayananda Saraswati's integrity. Swami ji was among the greatest social reformers in India, who laid bare all the religions Hinduism, Islam and Christianity in his book Satyarth Prakash (light of truth) at the end of 19th century. I am following the same book to learn about Islam.
6) launched fierce attack on west, and blamed west for problems of India.
I am putting this conversation here, it is in Hindi and quite lengthy

Taufiq,ब्रिटन ने अगर ज़ाकिर नायक को अपने यहाँ आने से रोक रखा है तो इससे इतना खुश होने की आवश्यकता नही है , यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह गरविले विदेशी आख़िर कब तक अपनी हेकड़ी दिखा कर भारतीय गणराज्य के नागरिकों को इस प्रकार अपमानित करते रहेंगे . बहुत दिन नही हुए जब कनाडा ने भारतीय रक्षा सेवा और भारतीय ख़ुफ़िया विभाग के सेवा निवृत्त कर्मचारियों को 'आतंकवादी' गतिविधि से जुड़ा हुआ बता कर अपने देश में प्रवेश नकार दिया . आख़िर कब तक भारतीयों का इस प्रकार अपमान होता रहेगा?


जब आप जाकिर नायक जैसों को प्रवेश नकारने पर इतना खुश होते हैं तो यह भी याद कीजिए किस प्रकार भारतीय राज्य के 'चुने' हुए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ब्रिटन , यरोपियन यूनियन और अमरीका ने वीज़ा नकार दिया. जर्मनी के राजदूत के भारत आ कर गुजरात के बारे में अनुचित टिप्पणी करने पर आपके तन बदन में आग लग जाती है और आपकी तयोरियाँ चढ़ जातीं हैं किंतु आप ही के देश के अल्पसंख्यक समुदाय से विद्वान के अपमान पर आप खुश होते हैं , क्यों???? जब आप अपने देशवासी का अपमान पचा सकते हैं तो खुदा न ख़ास्ता कल को आपका अपमान विदेश में हो जाय तो कोई कुत्ता आपको पूछने न आएगा , तब रोते रहिएगा अपनी किस्मत पर , भारतीय उच्चायोग का यों भी विदेशों में अपने नागरिकों की देखभाल करने का अच्छा रिकार्ड नही हैं. जब आप आपसी दुश्मनी भुला कर अपने देशवासी का सान्त्वन नही कर सकते तो धिक्कार है. शायद हम भारतीयों की यह नियती ही है विदेशों में जूते खाने कि , और शायद हम इस लायक हैं भी.

Sarvesh,      जो व्यक्ति श्रीमान जाकिर नायक को विद्ववान मानते हैं उनके मानसिक संतुलन पर संदेह होता है इन प्रकांड विद्वान महाशय के वचन सुन कर आप हतप्रभ रह जाते हैं एक तरफ तो ये दावा करते है की वो चिकित्सक हैं और दूसरी ओर कहते हैं की पशुओं को हलाल करने पर पीड़ा नहीं होती. और सुनिए, यदि कोई इस्लाम का परित्याग करता है तो उसकी हत्या कर देनी चाहिए, आतंकवाद कोई बुरी बात नहीं है. यदि कोई पत्नी अपने पति की बात नहीं मानती है तो उसकी 'हलकी' पिटाई करनी चाहिए, इस्लाम सही है क्योंकि कुरान में लिखा हुआ है और कुरान सही है क्योंकि अल्लाह ने ऐसा कहा है सभी धर्म गलत हैं इस्लाम सही है धरती चपटी है, सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के चारो ओर परिक्रमा करते हैं धरती स्थिर है आप इस विद्वान का स्तर तो देख ही चुके हैं रही बात खुश होने की तो एक मुर्ख अपराधिक प्रवृति के व्यक्ति से किसे सहानभूति हो सकती है? उन्होंने देश और समाज के लिए ऐसा क्या कर दिया की जाकिर नायक के अपमान को देश का अपमान मन जाये? ब्रिटेन की लोकतान्त्रिक परंपरा है और इसका निर्वहन भी वो बखूबी करते हैं. अपने नागरिको की सुरक्षा के लिए जो बन पड़ता है ब्रिटेन का शासन उसे करता है.

Taufiq,आप बात को दूसरी ओर मोड रहे हैं यहाँ वीसा न देने की वजह विद्वत्ता नही है एक समुदाय विशेष के प्रति दुराग्रह है , चाहें तो आप खुश हो लीजिए की एक मुसलमान को ब्रिटन ने दुतकार दिया , लेकिन भाई मेरे यह बात 'मुसलमान' के अपमान की नहीं बल्कि भारतीय नागरिक के अपमान की है , और मुझे हैरत है की आप जैसे लोग अपने हम वतनों को भाषा प्रांत और मज़हब में बाँटते हो. ऐसे तो अमरीकी कौंसलेट भी सरदारों और गुजरातियों और तेलुगु लोगों को वीज़ा देने में कंजूसी करता है लेकिन इस बात से कोई उत्तर भारतीय बिहारी या मराठी तो खुशियाँ मनाने नही लग जाता . खोट आपकी सोच में है न की 'बेचारे' जाकिर नायक में .
अब ब्रिटन ने उसको वीज़ा नकार दिया तो आप उसकी तरफ़दारी करते हैं भूल गये यह वही ब्रिटन है जिसने सावरकर को काले पानी भेज दिया , जलिया वाला बाग में हज़ारो हिन्दुस्तानी मारे , भगत सिंह सुखदेव राजगुरु जैसे अनगिनत लोगों को फाँसी दे दी , आप तो ब्रिटन की तारीफ करते रहिए .

sarvesh ,आप ने कदाचित जाकिर नायक जी के प्रवचन नहीं सुने वो किस प्रकार भड़काऊ बातें करते हैं ये सर्वविदित है, यदि आपको कोई संशय है तो कृपया यू तुबे ट्यूब पर जा कर पुष्टि कर सकते हैं मुझे न तो मुसलमानों से कोई घृणा है और न ही जाकिर नायक को वीसा न मिलने पर प्रसन्नता अथवा क्षोभ, परन्तु मुझे संतोष है की इसलाम जैसी अमानवीय विचारधारा को छल कपट से फ़ैलाने वाले व्यक्ति को वीजा नहीं मिला. रही बात ब्रिटेन की तो मुझे ये पता है की ब्रिटेन आधुनिक सभ्यता का सिरमौर है मै उनमे से हूँ जो पश्चिम की उन्मुक्त कंठ से प्रसंशा करते हैं, हम एक हज़ार वर्षों तक दास थे तो कोई भी मालिक अपने दास को सर पर नहीं बैठाता कम से कम ब्रिटिश बर्बर नहीं थे अन्यथा क्रांतिकारियों को समभा जी महाराज और बाबा बंद सिंह बहादुर जैसी मृत्यु का सामना करना पड़ता. यदि ब्रिटेन को मुस्लिमो से दुराग्रह होता तो उन्होंने पांच करोड़ मुस्लिम जन्शंख्या को अपने यंहा आने ही न दिया होता. यदि कोई अन्य राष्ट्र किसी व्यक्ति विशेष को वीसा नहीं देता तो इसमें प्रार्थी के राष्ट्र का अपमान बिलकुल नहीं है तौफिक जी यदि रिलिज़न झूठ का पुलिंदा है तो इस्लाम इस का उत्कर्ष है ज़रा अपने अन्दर के इंसान से पूछिए की इस्लाम ने दुनिया को रक्तपात के अलावा और क्या दिया है क्यूँ आप एक ऐसे व्यक्ति का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया को घोर अन्धकार की तरफ ले जाना चाहता है?

आप ने कदाचित जाकिर नायक जी के प्रवचन नहीं सुने वो किस प्रकार भड़काऊ बातें करते हैं ये सर्वविदित है, यदि आपको कोई संशय है तो कृपया यू तुबे ट्यूब पर जा कर पुष्टि कर सकते हैं मुझे न तो मुसलमानों से कोई घृणा है और न ही जाकिर नायक को वीसा न मिलने पर प्रसन्नता अथवा क्षोभ, परन्तु मुझे संतोष है की इसलाम जैसी अमानवीय विचारधारा को छल कपट से फ़ैलाने वाले व्यक्ति को वीजा नहीं मिला. रही बात ब्रिटेन की तो मुझे ये पता है की ब्रिटेन आधुनिक सभ्यता का सिरमौर है मै उनमे से हूँ जो पश्चिम की उन्मुक्त कंठ से प्रसंशा करते हैं, हम एक हज़ार वर्षों तक दास थे तो कोई भी मालिक अपने दास को सर पर नहीं बैठाता कम से कम ब्रिटिश बर्बर नहीं थे अन्यथा क्रांतिकारियों को समभा जी महाराज और बाबा बंद सिंह बहादुर जैसी मृत्यु का सामना करना पड़ता. यदि ब्रिटेन को मुस्लिमो से दुराग्रह होता तो उन्होंने पांच करोड़ मुस्लिम जन्शंख्या को अपने यंहा आने ही न दिया होता. यदि कोई अन्य राष्ट्र किसी व्यक्ति विशेष को वीसा नहीं देता तो इसमें प्रार्थी के राष्ट्र का अपमान बिलकुल नहीं है तौफिक जी यदि रिलिज़न झूठ का पुलिंदा है तो इस्लाम इस का उत्कर्ष है ज़रा अपने अन्दर के इंसान से पूछिए की इस्लाम ने दुनिया को रक्तपात के अलावा और क्या दिया है क्यूँ आप एक ऐसे व्यक्ति का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया को घोर अन्धकार की तरफ ले जाना चाहता है?
आप ने कदाचित जाकिर नायक जी के प्रवचन नहीं सुने वो किस प्रकार भड़काऊ बातें करते हैं ये सर्वविदित है, यदि आपको कोई संशय है तो कृपया यू तुबे ट्यूब पर जा कर पुष्टि कर सकते हैं मुझे न तो मुसलमानों से कोई घृणा है और न ही जाकिर नायक को वीसा न मिलने पर प्रसन्नता अथवा क्षोभ, परन्तु मुझे संतोष है की इसलाम जैसी अमानवीय विचारधारा को छल कपट से फ़ैलाने वाले व्यक्ति को वीजा नहीं मिला. रही बात ब्रिटेन की तो मुझे ये पता है की ब्रिटेन आधुनिक सभ्यता का सिरमौर है मै उनमे से हूँ जो पश्चिम की उन्मुक्त कंठ से प्रसंशा करते हैं, हम एक हज़ार वर्षों तक दास थे तो कोई भी मालिक अपने दास को सर पर नहीं बैठाता कम से कम ब्रिटिश बर्बर नहीं थे अन्यथा क्रांतिकारियों को समभा जी महाराज और बाबा बंद सिंह बहादुर जैसी मृत्यु का सामना करना पड़ता. यदि ब्रिटेन को मुस्लिमो से दुराग्रह होता तो उन्होंने पांच करोड़ मुस्लिम जन्शंख्या को अपने यंहा आने ही न दिया होता. यदि कोई अन्य राष्ट्र किसी व्यक्ति विशेष को वीसा नहीं देता तो इसमें प्रार्थी के राष्ट्र का अपमान बिलकुल नहीं है तौफिक जी यदि रिलिज़न झूठ का पुलिंदा है तो इस्लाम इस का उत्कर्ष है ज़रा अपने अन्दर के इंसान से पूछिए की इस्लाम ने दुनिया को रक्तपात के अलावा और क्या दिया है क्यूँ आप एक ऐसे व्यक्ति का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया को घोर अन्धकार की तरफ ले जाना चाहता है?
Taufiq इस्लाम को अमानवीय विचारधारा बताने वाले आप कौन होते हैं? आपका इस्लाम या किसी भी अन्य मज़हब के बारे में कितना ज्ञान है? क्या आप जानते हैं दुनिया में मौजूद करोड़ों लोग पूरे धर्मों को अमानवीय विचारधारा मानते हैं? यदि कोई गैर हिंदू हिंदू धर्म को 'अमानवीय बर्बर विचारधारा' कहे तो आपको कैसा लगेगा? शब्दों का प्रयोग कृपया चुन कर करिए श्रीमान.
ब्रिटन का पतन निहित है , और ब्रिटिश नागरिक बर्बर से बदतर हैं क्या आप भूल गये इन ब्रिटिशों ने १८५७ के क्रांतिकारियों के साथ कैसा सुलूक किया? आप आज़ाद भारत में पैदा हुए हैं इसलिए आप ब्रिटन द्वारा की गयी ज़्यादतियों को नही जानते , ज़रा बड़े बुज़ुर्गों से मालूम कीजिए , जिनको आप आधुनिक सभ्यता का सिरमौर बता रहे हैं वह कसाई से भी गये बीते हैं.

मैं जाकिर नायक का समर्थन नही कर रहा , मैं एक भारतीय नागरिक को ब्रिटन में प्रवेश नकारे जाने की बात कह रहा हूँ .
sarvesh, क्यूँ भाई इस्लाम पर कुछ बोलने के लिए बहुत कुछ जानना जरुरी है क्या? वैसे में आपको बता दूँ की यदि कोई हिन्दू धर्म को हिंसक और बर्बर कहेता है तो मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगेगा परकहने वाले को साबित करना पड़ेगा? कितने हिन्दू, बौध या जैन धर्मावलम्बी भारत से अन्यत्र धार्मिक उन्माद में हत्या, आगजनी, बम विस्फोट करते हुए पकडे गए हैं? परन्तु इस्लामिक पंथ को मानने वाले मुसलमानों से दुनिया त्रस्त है?मुसलमान कितना भी कह ले की इस्लाम शांति का धर्म है, कोई नहीं मानता, पर यदि तुम कहोगे की बौध धर्म बर्बर है तो लोग तुम पर हसेंगे!मैंने अकारण ही नहीं कहा की इस्लाम अमानवीय रेलिजन है पिछले तीन महीनो से मैंने ईसके बारे में खूब पढ़ा है और हैरान हूँ की इस बर्बर विचाधारा को लोग कैसे आँख मुंड कर स्वीकार कर लेते हैं मेरा नाम सर्वेश है तो तुमे मान लिया की में हिन्दू हूँ और सोचा की कोई हिन्दू धरम को बर्बर कहेगा तो मुझे ठेस लगेगी तो में आपको बता दूँ की किसी मंदिर में गए हुए मुझे 13 वर्ष से भी अधिक का समय हो गया है, मै गुरद्वारे और पीर की दरगाह पर भी जाया करता था. आज के समय में, मैं धर्म को एक नास्तिक की भाँती समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ. राम, कृष्ण, गौतम बुध, महावीर जैन, जीजस क्रिस्ट इत्यादि के लिए मेरे ह्रदय में सम्मान है परन्तु भक्ति नहीं. परन्तु इस्लाम तथा मुहम्मद के लिए कोई सम्मान नहीं, और चाहता हूँ की सभी मुसलमान जितनी जल्दी हो सके इस अन्धकार से बाहर आ जाएँ.
रही बात ब्रिटेन की बात तो मुझे अच्छी तरह से पता है की उन्होंने भारत में क्या किया? भारतीयों पर अत्याचार किया परन्तु वे अपने साथ विज्ञानं का प्रकाश भी लाये, हिन्दू धर्म में कितनी कुरीतियाँ व्याप्त थी उन्होंने समाज सुधारको को पूरा अवसर दिया, ज्योतिबा फुले, रजा राम मोहन राइ, स्वामी दयानंदा, स्वामी विवेकानंद सभी ने कुरीतिओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई, मुझे खुसी है की भारत पर अंग्रेजो ने राज़ किया, ये हमारी कमजोरी थी की हम विदेशी आक्रमणकारियों को दूर नहीं रख पाए. वैसे भी जिस पीढ़ी ने हम पर राज़ किया वो कब की काल कवलित हो चुकी है तो अब किस प्रकार का वैर. क्या हमें उज्बेकिस्तान से इस लिए वैमनस्य का भाव रखना चाहिए क्यूंकि बाबर और तैमुर इसी देश के थे?
मैं फिर कहता हूँ की जाकिर नायक जैसे धूर्त लोगों को कोई भी शान्तिप्रिये देश वीजा देना नहीं चाहेगा. आप ब्रिटेन के निर्णय का विरोध करते हैं आप

Taufiq, बिल्कुल , किसी भी विषय पर टिप्पणी देने से पहले आपको उसे समझना ज़रूरी है वरना आपकी सन्दर्भहिन टिप्पणी गंभीरता से नहीं ली जाएगी .

आपको बुरा लगे न लगे , किंतु उस धर्म को मानने वालों को तो बुरा लगेगा ही लगेगा क्या नहीं? और कहने वेल तो कहेंगे ही सुबूत देने और जिरह करने के चक्कर में वह क्यों पड़ेंगे? आप अपना उदाहरण ले लो आपने कहना था सो कह दिया अब बातों का रुख़ मोड़ रहे हो.

पकड़ा जाना ही यदि क्राइटीरिया हो तो भाई कितने नामी गुंडे मवाली बदमाशों पर मुक़दमा दर्ज़ होता है? वह अपने रसूख का इस्तेमाल कर बच जाते हैं. वैसे मालगोंडा पाटिल , प्रज्ञा और पुरोहित जैसे लोग पकड़े भी गये हैं किंतु शायद आप के लिए वह हीरो हैं.

सवाल यह है आपके इस 'कोई' में केवल भगवा विचारधारा वाले अतिवादी शामिल हैं या हम जैसे अकिंचन भारतीय शामिल हैं? और किसी धर्म या संस्कृति को बर्बर कहने की धृष्टता तो मैं कभी न करूँगा , क्योंकि मैं सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं का सम्मान करता हूँ.

आप किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त लेखक की पुस्तकें पढ़ एक समुदाय या समाज के प्रति अपना दुराग्रह करेंगे तो यह सही नही होगा , किसी भी समाज या समुदाय के बारे में आपको अपनी राय बनानी है तो जाइए उन लोगों से मिलिए , उनके रीति रिवाज़ों से अवगत होइए उनके रहण सहन से परिचित होइए और तब आप किसी के बारे में ठोस राय बना सकते हैं. यों तो हिंदू धर्म के प्रति ग़लतफ़हमियाँ फैलाने वाले साहित्य की बाज़ार में कमी नहीं है किंतु उस साहित्य के आधार पर किसी समाज को बुरा भला कहना निरि मूर्खता होगी.

Taufiq आप चाहें जो हो किंतु आपकी वाणी में एक समुदाय के प्रति दुर्भावना झलकती है और इसका कारण आपने खुद कहा है की आपने वैसा साहित्य पढ़ा है , मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ अपने दिमाग़ के बंद दरवाज़े खोलिए और असत्य की चार दीवारी से बाहर आ जाइए.
ब्रिटन की काली करतूतों से आप अवगत हैं तो इतना भी जानते होंगे , फुले साहब और राजा राम मोहन राय जैसे तथाकथित समाज सुधारक क्रांतिकारियों के कितने बड़े विरोधी थे? इन्हीं फुले साहब ने १८५७ की लड़ाई को बंमानों की बग़ावत कहा था.

आप तो इस बात पर खुश हो लीजिए की हमारे देश पर अँग्रेज़ों ने राज किया किंतु उन क्रांतिकारियों की आत्मा ने कहीं आपके ऐसे विचार पढ़ लिए तो उनकी आत्मा जार जार रोएगी , इस 'कल' के लिए उन्होने अपने 'आज' की बलि दी.

उज़बेकिस्तान , ताजिकिस्तान और पाकिस्तान से हमारे देश के कोई मधुर संबंध तो हैं नहीं क्या यह इस बात का परिचायक नही है की हम अपने अक्रन्तओन के मूल को आज तक भूले नहीं हैं?

मैने पहले कहा है फिर कहता हूँ ज़ाकिर नायक से मुझे कोई सहानुभूति नही है किंतु एक भारतीय व्यक्ति को वीसा नकारे जाने की बात मुझे कचोट रही है.
sarvesh,हाँ मैं अपनी बेतुकी बात वापस लेता हूँ किसी विषय पर बोलने से पहले उसका समुचित ज्ञान होना आवश्यक है रही बात साहित्य पढने की तो मैंने किसी का लिखा हुआ साहित्य नहीं पढ़ा परन्तु कुरान हदीथ के इन्टरनेट पर उपलब्ध संस्करण पढ़कर जानकारी जुटायी है, हाँ इस दौरान मैने सत्यार्थ प्रकाश के उस अध्याय को पढ़ा जिसमे इस्लाम की विवेचना स्वामी दयानंदा जी ने की है, इसके अलावा समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले सम्पद्किये की भी सहायता ली. मेरा प्रयतन येही है की इस्लाम का अध्ययन एक तरफ़ा न हो.
भारत में रहकर मुझे मुसलमानों के बारे जानने के लिए कही जाने की जरुरत नहीं है मेरे स्कूल और कॉलेज के कुछ मित्र मुस्लिम हैं मैंने पहले भी कहा है अब भी कह रह हूँ की मुसलमानों से मेरा कोई दुराग्रह नहीं है परन्तु इस्लाम से मेरा वैर है ज्योतिबा फुले कट्टर ब्रह्मिन विरोधी थे पर उनकी १८५७ की क्रांति पर की गयी टिप्पड़ी को आप इस सन्दर्भ में देख सकते हैं की ब्राह्मणों ने दलितों पर घोर अत्याचार किये थे, इस लिए अंग्रेजो का शसन ज्योतिबा फुले को अच्छा लगा होगा.

तज़ाकिस्तान, उज्बेकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते उदासीन हैं, अफगानिस्तान के साथ अच्छे, और केवल पाकिस्तान के साथ ख़राब.
मैं बर्बर को बर्बर न कहूँ तो क्या कहूँ?इस्लाम न तो सभ्यता है और न ही संस्कृति, यह असभ्यता और कुसंस्कृति मुझे किसी से वोटनहीं मांगना है, तो मैं जो अभी तक समझ सका हूँ उसके अनुसार बोलूँगाही.
Sarvesh,आप बार बार बात को दूसरी ओर मोड़ रहे हैं मैंने आप से पुचा था की कितने हिन्दू, बौध अथवा जैन धर्मावलम्बी अपनी विचारधारा को फ़ैलाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हुए भारत से अन्यत्र कहीं पकडें गए हैं आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, मैंने कब कहा की प्रघ्या ठाकुर, या कर्नल पुरोहित मेरे आदर्श हैं, आतिफ अमीन,सफ़दर नागोरी ने मासूम लोगों को मारा तो यही कार्य इनोहोने भी किया,और इनकी भी आलोचना होनी चाहिए. मेरी वाणी से यदि आपको किसी समुदाय विशेष के प्रति दुराग्रह सुने पड़ता है तो क्षमा कीजिये मई इसमें कुछ नहीं कर सकता, मेरी समझ से इस्लाम वैर को बढ़ावा देने वाला रिलिजन है और इसके विरुद्ध मुखर होकर बोलने की आवश्यकता है क्यूंकि मै इस्लाम का विरोध करता हूँ, और जाकिर नायक जी इसके प्रचारक हैं तो मै तो येही चाहूँगा की वो इस विचारधारा का प्रचार न कर पाए. वैसे भी वो अपने आप को भारतीय से पहले इस्लामवादी मानते हैं तो स्तर पर भी मैं उनका समर्थन नहीं कर सकता.
Taufiq, सत्यार्थ प्रकाश शायद पहला ऐसा हिंदू ग्रंथ है जिसमे एक पूरा अध्याय मुसलमानों और पैगंबर मोहम्मद को समर्पित किया गया है , इसका कारण शायद आप मुझसे बेहतर जानते हैं . किसी धर्म के प्रति आपको राय बनानी है तो उसके धर्मग्रन्थ उसके मूल भाषा में पढ़िए . अनुवाद में अक्सर भारी ग़लतियाँ होतीं है और बहुतेरे अनुवादक स्वयं पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं आप मॅक्स मूलेर या अन्य पश्चिमी व्यक्तियों द्वारा हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुवाद का उदाहरण देखें.

इंटरनेट पर आप जो पढ़ें इसकी कोई गारंटी नही है की वह अधिकृत जानकारी हो , आप मिशनरी की वेब साइट देखिए हिंदुओं के बारे में अनाप शनाप लिखा जाता है , केवल इंटरनेट पर लिखा है इसलिए वह सही होगा ऐसा मानना समझदारी नही होगी.

भारत में रहकर भी कोई इस बात को सीना ठोंक कर नही कह सकता कि वह मुस्लिम रीति रिवाज़ों और रवायतों से १००% परिचित है , भारत के कई क्षेत्रों में मुसलमानों से ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो वह किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों यह एक कड़वी सच्चाई है.

चलिए आपने यह तो माना की आपका इस्लाम से दुराग्रह है , किंतु कभी आपने किसी व्यक्ति को ऐसे कहते सुना है की "मुझे अपने सिर से प्यार है धड़ से नही?" आपके कहने से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है.

मुझे फुले साहब से कोई शिकायत नही है और न ही ब्राम्‍हणों से कोई हमदर्दी है किंतु जो सच है सो है. यूँ तो राजा राममोहन राय भी बंगाल के ब्राह्मण परिवार से आते थे , किंतु वहीं के कर्मठ ब्राह्मणों ने उन्हें जाती निकाला दे दिया था तो केवल इसलिए नहीं कि वह हिंदू धर्म के रीति रिवाज़ों को बदलने की चेष्टा कर रहे थे बल्कि इसलिए भी की वह अंग्रेज सरकार को हिंदू धर्म के नियम बदलवाने में शामिल कर रहे थे.

अंग्रेज , अँग्रेज़ों का शासन उनकी समाज व्यवस्था क़ायदे क़ानून बर्बर और निकृष्ट कोटि का है जो रंगभेद और वंश वाद पर आधारित है , भारत ने अपना संविधान अंग्रेज़ो की नकल कर बनाया और इसे भारतीय परिदृश्य में ढालने के लिए 'लेकिन' 'किंतु' जैसे हज़ार दो हज़ार अपवाद डाल दिए और यही वजह है कि भारत में क़ानून के बारह क्यों बजे हुए हैं.
sarvesh,आप ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ी है यदि हाँ तो आप ने ये भी पढ़ा होगा की इसमें कुछ भी दयानद जी ने स्वयं अनुवाद करके नहीं लिखा बल्कि इस्लामिक विद्वानों द्वारा अनुवादित सामग्री का ही प्रयोग किया है यह बात अध्याय के प्रारंभ में लिखी हुई है हाँ यह बात कुछ और है की ' कोई मुस्लिम विद्वान कहता है की पत्नी को पीटना चाहिए , कोई कहता है की हल्का पीटना चाहिए'.जब इस्लाम के विद्वानों को ही संदेह है तो च्रिस्तियन मिशनरियों को क्यूँ दोष देते हो. अब आप ने भी वोही पासा फेका है जो इस्लामिक क्षमायाचक फेंकते हैं, मैं पहले अरबिक सीखूं और फिर कुरान और हदीथ पढूं!नहीं श्रीमान इससे अच्छा ये होगा की कोई इस्लामी व्यक्ति सत्यार्थ प्रकाश को गलत साबित कर के उसपर बैन लगवा दे. मैं आप से बुधिमानिपूर्ण सुझाव की अप्पेछा करता हूँ इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री के बारे में आप की बात में कुछ दम है क्यूंकि इस्लामिक साईट चीज़ों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करती हैं, जैसे की 'कुरा'न में बिग बंग थीओरी की बात' और एंटी इस्लामिक वेब साईट इनको बिलकुल बकवास करार देती हैं परन्तु जो हमारे आस पास घटित हो रहा है उससे देख कर सार्थक निष्कर्ष पर पहुँच सकता हूँ. दरअसल अधिकतर मुसलमान भारत ही नहीं वरन दक्षिण एशिया में पहचान के संकट से गुजर रहे हैं वे अपने आप को अरब, उज्बेकिस्तान तज़ाकिस्तान या फिर अफगानिस्तान से जोड़ कर देखते हैं, पर उनका रंग रूप और काफी हद तक संस्कृति भारतीय है, अब आप ही बताएं की उसकी रगों में दौड़ रहा खून भारतीय है की विदेशी? क्याउसे इस कडवी सच्चाई का सामना करना कोई हैरत की बात है.
हाँ मुझे इस्लामिक विचारधरा से दुराग्रह है इस विचारधारा ने १.५ अरब लोगो को बंधक बना रखा है ये वोही विचारधारा है जो ५००० व्यक्तियों के मारे जाने पर लोगों को नाचने और उत्सव मानाने के लिए प्रेरित करती है? क्या मई इन घटनाओं को न देखू , अपने आप से न पुछु की क्यूँ ? क्या सुतुर्मुर्ग की तरह रेत में सर गाड़ लूँ. आप ही बताये तौफिक जी मै क्या करूँ कैसे भूल जाऊं की दिवाली से ठीह दो दिन पहले मेरे शहर के कई दिए बुझा दिए, कैसे भूल जाऊं की गोधरा में ५९ लोगों को जिन्दा जला दिया गया? कैसे भूल जाऊं की गुजरात में सैकड़ो लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया? ऐसी हजारों घटनाये हैं और इन सब के पीछे उस इस्लामिक विचारधरा का ही हाथ है अब मैं दुराग्रह न करूँ तो क्या करूँ
Sarvesh,यदि रजा राममोहन राय ने बहु विवाह, सती प्रथा का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया तो इसमें क्या बुराई है? उन्होंने अंग्रेजो से कुप्रथाओं के विरुद्ध कानून बनाने की मांग ही तो की थी! शायद आप जाकिर नायक जी को वीसा न मिलने से क्षुब्ध है और इसलिए ब्रिटिश साम्रज्य द्वारा किये गए अछे कार्य भी आपको बर्बर और असभ्य लग रहे है! बर्बर तो उस समय का भारतीय समाज था जो दास मानसिकता से ग्रसित था और अपने ही लोगो को दुःख पहोंचा रहा था! आप अनर्गल आरोप लगा रहे हैं ब्रिटिश नागरिक सभ्य और सुशील होते हैं भारतीय संविधान में खामियां हैं तो उसके लिए ब्रिटेन दोषी नहीं है? आप माने या न माने मानवता की नई परिभाषा हमें पश्चिम ने ही सिखाई है सुडान में पड़ा अकाल इस बात की गवाही देता है जब इस्लामिक राष्ट्र मुफ्त के मिले हुए पेट्रो डॉलर जिहाद पर खर्च कर रहे थे तो अमेरिका और यूरोप के देश उन्हें रहत सामग्री पहुंचा रहे थे! क्या आप इन चीजों से आँखे मूँद लेते हैं या आप भी उन्हें काफ़िर समझ कर क्रूर और बर्बर मान बैठे हैं( क्षमा कीजिये मेरा मतलब आपको नीचा दिखाना नहीं बल्कि ये जानना है की कंही आप पूर्वाग्रह से पीड़ित तो नहीं हैं?)
Taufiq,सत्यार्थ प्रकाश लिखने के लिए स्वामीजी ने भले ही इस्लामी आलीमों द्वारा अनुदित पुस्तकों को रेफर किया हो , किंतु इससे यह नही पता लगता की उन इस्लामी विद्वानों को इस्लाम की समझ कितनी थी. जैसा की आपने बताया की स्वामीजी ने उनके 'लिखी सामग्री' का अपनी पुस्तक में इस्तेमाल किया है तो यह बहुत मुमकिन है कि सत्यार्थ प्रकाश का १४ वाँ अध्याय त्रुटि युक्त हो.

मुस्लिम विद्वान यदि पत्नी को मारने पीटने की बात करते हैं तो कोई भी आधुनिक विचारों वाला व्यक्ति इसका समर्थन नही करेगा , परंतु बंधुवर यह बताएँ "नारी नर्क का द्वार है" और "ढोर गँवार , पशु , शूद्र नारी...." जैसे वाक्यों का प्रचलन क्या गोस्वामी तुलसीदास जी ने नही किया था?
मानव चाहे दुनिया के किसी कोने में क्यों न हों , उनकी समस्याएँ एक हैं , परिवार और समाज के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी एक सी हैं तो जाहिर है दुनिया के विभिन्न मानव समाजों में कुरीतियाँ भी एक सी होंगी , फिर हम तो भारतीय हैं हमारा समाज एक है. तो महिलाओं से जुड़ी समस्याओं का धार्मिक आधार पर विभाजित करना ठीक नहीं , महिलाओं के प्रति ऐसी भावना सभी समाजों में स्मन रूप से व्याप्त है जिसे दूर होना चाहिए , मुस्लिम विद्वान के व्यक्तव्य का यहाँ ज़िक्र करने का कोई औचित्य ही नहीं.

और मैं कोई पासा नही फेंक रहा हूँ श्रीमान एक ईमानदार सलाह भर दे रहा हूँ जो वेदों शस्त्रों में पारंगत पंडित भी टिप्पणीकारों से करते रहे हैं कि पहले संस्कृत सीखो , वेदों पुराणों का अध्ययन करो तब अपनी राय बनाओ.
मुझे नही लगता की एक अप्रचिलित पुस्तक के छोटे अध्याय भर से समग्र मुस्लिम समाज को कोई ख़तरा हो सकता , स्वामी जी ने जो लिखा है वह उनकी व्यक्तिगत सोच है किंतु उनकी सोच को न मानने वाले व्यक्ति संसार में करोड़ों हैं .
आपने पुस्तक को प्रतिबंधित करने की बात करी है तो श्रीमान , यह मामला दिल्ली हाइ कोर्ट के आधीन है इसलिए इस पर टिप्पणी करना उचित नही होगा , कोर्ट जो सही समझेगी सो करेगी.

Taufiq, आपका 'इस्लामिक वेब साइट्स' द्वारा तथ्यों को बढ़ा चढ़ा कर बताने वाली बातों पर पूरे इस्लामी समाज को दोषी ठहराया नही जा सकता , खास तौर से तब जब 'हिंदू वेबसाइट्स' भी ऐसे कार्यों में लिप्त पाईं गयीं है. मैं बाकी वेबसाइट्स का नही , इसी फोरम पर हुई चर्चा का उदाहरण देना चाहूँगा

१. फोरम के एक वरिष्ठ सदस्य यह कहते हुए पाए गये की गाय के गोबर में रेडियोधर्मी पदार्थों को ख़त्म करने की शक्ति पाई जाती है.
२. प्राचीन ऋषि मुनियों को विमान बनाने और उसे उड़ाने में महारत हासिल थी.
३. ब्रम्‍हास्त्र , वैष्णवस्त्र जैसे शस्त्र आज की बल्लेस्टिक मिज़ाइल और एटम बम जीतने विनाश कारी थे.

४. विश्व में हिंद महासागर के अतिरिक्त दुग्ध सागर [क्षीर सागर] घृत सागर , और दही सागर हैं .
५. चंद्र , मंगल ग्रह और बृहस्पति जैसे खगोलीय पिंडों पर कदम रखने वाला प्रथम व्यक्ति हिंदू ऋषि मुनि था , इत्यादि इत्यादि....

जब आप एंटी इस्लामिक वेबसाइट्स को देख कर इस्लामिक वेबसाइट्स को बकवास करार देते हैं तो एंटी हिंदू वेबसाइट्स न सही , कोई अन्य साइन्स वेबसाइट ही देख कर हिंदू पुराणो में कही गयी बातों की सत्यता की पड़ताल करें कौन रोकता है?
Taufiq,संकट से तो हम आप समान रूप से गुजर रहे हैं इसलिए आपको कभी मुसलमान ' फिक्षनल आइडेंटिटी क्राइसिस ' से जूझते नज़र आते हैं . आज भारतीय मुसलमानों का ताजिकिस्तान , उज़बेकिस्तान कज़ाकिस्तान से दूर दूर तक कोई रिश्ता नही है , आफ्गानिस्तान से भी वैवाहिक रिश्ते न के बराबर हैं , पाकिस्तान और बांग्लादेश से रिश्ते ज़रूर है किंतु क्या ऐसे ही रिश्ते हिंदुओं के नेपाल , इंडोनेसिया और श्रीलंका से नहीं है क्या? जब महाराष्ट्र के मराठी को किसी बिहारी , उत्तर प्रदेशी के महाराष्ट्र आने से बुरा लगता है , बिहारी को गुजराती के बिहार आने से बुरा लगता है , दक्षिण भारतीय राज्यों को उत्तर भारतीयों के अपने राज्य में आने से बुरा लगता है तो क्या यह राष्ट्रीय क्राइसिस नही है? एक भारतीय अपने आप को बंगाली , पंजाबी , मराठी पहले मानता है भारतीय बाद में क्या यह आइडेंटिटी क्राइसिस नही है?


दंगे फ़सादो में मरने वाले केवल हिंदू तो न थे? कई मुसलमान भी तो मारे गये? क्या नहीं? पिछली बातों पर छाती पीट पीट कर रोने से क्या लाभ? क्या आपने कभी सोचा है भारतीय मुसलमानों को जब आप 'पाकिस्तानी' और 'विदेशी' कह कर संबोधित करते हैं तो उनके दिल पर क्या गुजरती है? आपको पाकिस्तानी टीम का समर्थन कर रहे कथित भारतीय मुसलमानों के खुशियाँ मनाने पर आपत्ति होती है , किंतु आप ही की बिरादरी के लड़के कल इंग्लेंड फ्रांस ब्राज़ील अर्जेंटीना जैसे देशों के फुटबाल मॅच जीतने पर सड़कों पर शोभा यात्रा निकलेंगे तो आपको कोई आपत्ति न होगी.

आपकी विचारधारा को बदलने की मेरी कोई मंशा नही है , समय के साथ शायद यह बदल भी जाए लेकिन न तो मेरे पास इतना समय है और न ही संसाधन कि आपको विस्तार से समझाऊं


Taufiq,मुझे इससे कोई आपत्ति नही है विधवाओं का घर बसे उनका कुनबा आबाद हो इससे खुशी की बात और क्या हो सकती है? आपत्ति उस समय के लोगों को थी और आज भी विधवा विवाह या नारी शिक्षा के बारे में लोगों का नज़रिया ठीक नही है.
मुझे नही लगता की राय साहब को अँग्रेज़ों से क़ानून बनाने के लिए कहने की ज़रूरत थी , इस कुप्रथा का समर्थन क्रांतिकारियों ने भी कभी नही किया किंतु अंग्रेज सरकार द्वारा इस मामले में पड़ने से मामला गड़बड़ हो गया , इस कुप्रथा का विरोध होने के बजाए तत्कालीन समाज ने इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप माना , और ऐसी प्रथा समाज में आज भी विद्यमान हैं.

अकालग्रस्त सूडान को मदद पंहुचाने में भी इन पश्चिमी देशो का स्वार्थ है आज़ादी के समय इन्होने पाकिस्तान का बीज बोया जो दक्षिण एशिया में आज विष वृक्ष बन गया है और तमाम पश्चिमी देश उसे हर संभव सहायता करते हैं क्या इस सच्चाई से आप अनभिज्ञ हैं? आपका पश्चिमी देशो की पैरवी का कारण समझ से परे है
Sarvesh,यदि इस्लामिक विद्वानों का अनुवादन सही नहीं है, गैर इस्लामिक विद्वानों का अनुवादन तो आपके अनुसार गलत ही होगा तो इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता!हो सकता है अनुवादन सही हो विचारधारा ही गलत हो! आप अनुवादन की बात क्यूँ उठा रहे हैं आप को अच्छी तरह से मालूम है, हैरानी मुझे इस बात की है की दुनिया में न जाने कितने रिसर्च पेपर हर वर्ष दुनिया की अलग अलग भषाओं में प्रकाशित होते हैं और उनका हर भाषा में अनुवादन भी होता है परन्तु कभी भी ये अनुवादन की समस्या आड़े नहीं आती विज्ञानं की वो जानकारी जो जापान में पाई जाती है वोही भारत में भी है, है की नहीं.

आप मुझे -१ -१ = +२ सिखा रहे हैं क्या दो गलतियाँ मिल कर एक सही बन सकती हैं नहीं मित्रवर.

मित्र आप बात को समझ नहीं रहे हैं, दुनिया में सामाजिक बुराइयाँ एक सी हो सकती हैं परन्तु कुछ बुराइयाँ धर्म से प्रारंभ हो कर समाज में घुसपैठ करती हैं, क्या शाहबानो की मुठियों की दस्तक, भारतीय न्यायालय के पट खुलवा पाईं, नहीं !इमराना जी को फूटबाल बना कर किसने रख दिया इस्लाम ने, मुल्ला मौलवियों ने नहीं, मुल्लाओं ने वोही किया जो कुरआन और हादिथ के अनुसार था!
sarvesh,सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है, परन्तु यदि उनका धार्मिक आधार हो तो समस्या होती है, और समाज स्त्रियों को कम से कम बराबरी पर आने का अवसर तो दे रहे हैं, परन्तु इस्लामिक समाज में इसके उलट उन्हें दबाया जा रहा है, अभी कुछ दिन पहले पर्दा करने के सन्दर्भ में आया फतवा तो आप को याद ही होगा.
जी नहीं श्रीमान, आनुवाद पढने में कोई हर्ज़ नहीं है, यदि आज मैं संस्कृत और उर्दू सिखने बैठ जाऊं, और बाद में मुझे कोई अंतर न मिले तो मैं तो ठगा जाऊँगा.

जी नहीं, सत्यार्थ प्रकाश के १४ अध्याय में स्वामी जी ने अपनी व्यक्तिगत राय नहीं दी बल्कि इस्लामिक विद्वानों की अनुवादित सामग्री को अपने प्रश्नों के साथ लिखा है, कुरान स्वामी की नहीं बल्कि 'पैगम्बर' जी की व्यक्तिगत राय है,
हाँ आपकी बात से मैं १००% सहमत हूँ,सत्यार्थ प्रकाश से मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है इसको पढ़ कर मुस्लिम खतरे से बाहर आ जायेंगे, खतरा तो इस्लाम जैसी अमानविए विचारधारा से है!
मेरी जानकारी के अनुसार दिल्ली उच्न्यालय ने मामले को निरस्त कर दिया है तथा वादी को न्यालय का समय ख़राब करने के लिए कड़ी फटकार लगाई है!

Sarvesh,भाई आप ने मेरी पोस्ट को ठीक से पढ़े बिना जवाब दे दिया, मैं इस्लामिक विचारधारा के विरुद्ध हूँ नाकि इस्लामिक समाज के.

यदि ऐसा किसी व्यक्ति ने कहा है तो सारी बातें गलत हैं, परन्तु इससे अधिक मैं क्या कह सकता हूँ.
आप फिर मेरी बात ठीक से नहीं समझे, मैंने कहा था' इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री के बारे में आप की बात में कुछ दम है क्यूंकि इस्लामिक साईट चीज़ों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करती हैं, जैसे की 'कुरा'न में बिग बंग थीओरी की बात' और एंटी इस्लामिक वेब साईट इनको बिलकुल बकवास करार देती हैं परन्तु जो हमारे आस पास घटित हो रहा है उससे देख कर सार्थक निष्कर्ष पर पहुँच सकता हूँ.
इस्लाम के बारे में मैं अपनी जानकारी इस लिए जुटा रहा हूँ क्यूंकि, इस पंथ को मानने वालों ने दुनिया भर में आतंक मचा रखा है और मैं जाना चाहता हूँ की ऐसी क्या चीज़ है जो उन्हें चैन से नहीं बैठने देती, मेरी अभी तक की जानकारी के अनुसार इसका जवाब कुरान और हदीथ हैं, इसके अलावा मेरी धर्म में और कोई रूचि नहीं है,अन्य धर्मों के बारे में जो सहज रूप से समझ आता है समझ लेता हूँ अन्यथा मुझे कोई परवाह नहीं है
की पुराण में सत्य लिखा है की असत्य है

sarvesh,पता नहीं मैं दूसरों के बारे में नहीं कहना चाहूँगा पर मैं प्रथम और अंतिम हर प्रकार से भारतीय हूँ तो मैं किसी भी identity crisis से पीड़ित नहीं हूँ! और मुझे पूर्ण विश्वास है की आप भी ऐसी किसी समस्या से ग्रसित नहीं होंगे! परन्तु मित्र आप मुस्लिम समाज को मुझसे बेहतर तरीके से जानते है प्रायः मुसलमानों में यह गलत्फेह्मी होती है की उनके पूर्वज मध्य एशिया, अफगानिस्तान या अरब से आये थे! अब आप बताइए यदि एक पूर्ण रूप से भारतीय व्यक्ति ऐसा कहता है तो उसे बहार से आया हुआ ही समझा जायेगा! मेरा पाकिस्तानी मित्र (काशिफ खान) कहता है की पाकिस्तान में पंजाब और सिंध प्रांत के "भारतीय" लोग अपने आप को गर्व से अरब से जोड़ कर देखते है मै यहाँ वैवाहिक रिश्तो की बात नहीं कर रहा हु!

जो भी राष्ट्रभक्त भारतीय है वह कभी भी identity crisis से नहीं जूझेगा! और जो लोग प्रन्तियेता को ऊपर रखते है उनसे मुझे कोई सहानुभूति नहीं है!

आप दंगे होने पर ये देखते है की मरने वाला हिन्दू था या मुसलमान? गोधरा में इस्लामिक विचारधारा से प्रेरित होकर ५९ लोगो को जीवित जला दिया गया, बम विस्फोटो में हज़ारों व्यक्ति मारे गए, दंगों में भी कितने ही मासूम लोग मारे गए इन सब के पीछे एक विचारधारा कार्य कर रही है और वह है "इस्लाम"!
मैं मानता हु जब दो टीमे खेल रही हो और उनमे से एक आप का अपना देश हो तो अपने देश का ही समर्थन करना चाहिए और यदि दूसरी टीम शत्रु राष्ट्र की हो तो ये और भी आवश्यक हो जाता है! मेरे विचार से यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो मेरी अंतरात्मा मुझे राष्ट्र द्रोही हे करार देगी! यदि दो अन्य राष्ट्रों के बीच में मैच खेला जाए तो हम किसी एक का समर्थन करे, दोनों का करे या किसी का न करे, क्या फरक पड़ता है!

मेरी विचारधारा आप तभी बदल सकते है यदि आप साबित करदे की इस्लाम और आतंकवाद का एक दुसरे से कुछ लेना देना नहीं है! अन्यथा मेरे जीवन का एक बड़ा हिस्सा लोगो को यही समझाने में बीतेगा की इस्लाम एक बर्बर और असभ्य विचारधारा है और जितनी जल्दी हो सके लोग इसे छोड़कर बहार आ जाये! अली सीना जी, M A Khaan और वाफा सुलतान जी कोई मूर्ख नहीं है जो इस विचारधारा के विरोध में है!

Sarvesh,आप बार बार हिन्दू धर्म को बीच में ला रहे हैं जिसकी मुझे कोई परवाह नहीं क्योंकि फैज़ल शेहजाद हनुमान चालीसा पढ़कर आतंकवादी नहीं बना, स्वर्गीय Daniel Pearl जैसे निरीह प्राणी को हलाल करते समय आतंकवादी गायत्री मंत्र नहीं बल्कि कालीमा पढ़ रहे थे, अजमल कसाब और उसके ९ साथी रामायण पढ़कर आतंकवादी नहीं बन गए! यकीन मानिए ये आतंकवादी कुरान का अक्षरशः पालन करते है और आप इस विचारधार समर्थन करके उनके जघन्य कृत्य में भागीदार बन रहे है! कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए कड़े कानून बनने ही चाहिए, आज जब कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्याएं honour killing सामान्य बातें है तो सरकार को कड़े कानून बनाने ही पड़ेंगे! कोई इसे हस्तेक्षेप मानता है तो मानता रहे, समाज के जागरूक होने का इंतज़ार करेंगे तब तक तो न जाने कितने मासूमो को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ेगा..... राजा राम मोहन राय ने भी यही किया था और ठीक किया था!
वाह तौफिक जी वाह, आपने कुतर्क की पराकाष्टा को लांघ दिया है! सौदी अरब और इरान जैसे देशो से इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कितना ही पैसा आतंकवादी संगठनों को पहुँचता है परन्तु इसमें आपको इन देशो की अच्छी मंशा दिखाई देती है परन्तु अफ़्रीकी देशों जिनमे से अधिकतर मुस्लिम राष्ट्र है को खाना कपडा और दवाइयां देने वाले राष्ट्र जिनमे यूरोप, ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका और जापान शामिल हैं, की मंशा पर आपको संदेह है, धिक्कार है आपकी ऐसी सोच पर!

अपनी मष्तिष्क पे पड़ी इस्लाम की चादर को हटाइये और देखिये सचाई एकदम शीशे की तरह साफ़ है! इस्लाम अमानविए विचाधारा है जिसके मानने वाले कुछ धनाड्य राष्ट्रों के पास आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए पैसा है पर स्वधार्मियों की मदद के लिए धनाभाव है! सच तो ये है की पश्चिम के दानदाता पूरी दुनिया में निश्वार्थ भाव से निर्धनों की मदद कर रहे हैं वारेन बफेट का नाम तो सुना ही होगा!

Taufiq,अब स्पष्ट तौर से कहूँ तो मेरा मतलब 'इंटर्प्रेटीशन' से है जिसकी जैसी सोच है वह वैसे ही धार्मिक ग्रंथों में लिखी गयी बातों को 'इंटर्प्रिट' [अर्थ लगाएगा] करेगा. रिसर्च पेपर्स को भी स्कॉलर्स अपने तौर से इंटर्प्रिट करते हैं और उसके अनुसार व्याख्या की जाती है जिस पर चर्चा कर किसी ठोस नतीजे पर पंहुचा जाता है.

पेपर प्रेज़ेंटेशन का उदाहरण देना वैध नही है , और भाई शाहबानो मामले में जो हुआ कुछ वैसा ही तो खाप पंचायत वाले कर रहे हैं क्या नहीं? सरकार पर क़ानून में बदलाव करने का दबाव डाला जा रहा है , अगर शाहबानो मामले में ग़लत हुआ तो गोत्र विवाद में भी ग़लत हो रहा है. खाप पंचायत वाले भी तो धर्मग्रन्थ के अनुसार माँग कर रहे हैं क्या नहीं?

स्वामीजी ने यदि इस्लाम पर लिखा १४ वा अध्याय किसी 'अन्य' की अनुदित सामग्री पर लिखा है तो शंका और बढ़ जाती है , उस अनुवादक का नाम पते से कदाचित् ही अवगत होगा , मेरे विचार में सत्यार्थ प्रकाश १९वीं शताब्दी के अंत में लिखा गया तब के जमाने में क़ुरान के अनुवादित संस्करण बिरले ही होते होंगे , आज भी कर्मठ मुसलमान क़ुरान को अरबी में ही पढ़ते हैं. ऐसे में स्वामी जी जो इस्लाम पर जानकारी दे रहे है वह असल में जानकारी न होकर उनके इस्लाम के प्रति विचार भर हैं.

मैने आपके विचारों को पढ़ा है और आपके द्वारा इस्लाम के विरोध में दिए गये तर्कों को बकायदा उदाहरण दे कर निरस्त किया है , आप उस पर कुछ न कह कर बार बार इस्लाम पर आतंकवादी विचारधारा को फैलाने का आरोप किए जा रहे हैं.
आप आतंकवाद को धर्म से जोड़ कर देखने की ग़लती कर रहे हैं , आपको कैसे लगेगा यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म पर देश में 'भगवा आतंकवाद' फैलाने का आरोप करे?
आपके पाकिस्तानी मित्र के पूर्वज कौन हैं इससे मुझे क्या लेना? पाकिस्तानी से आप यह तो उम्मीद नही करेंगे की वह अपने पूर्वजों को भारत से जोड़ कर देखें. आज पाकिस्तान और कश्मीर से स्थलांतरित व्यक्ति खुद का मूल भारतीय बताएगा या पाकिस्तानी?
दंगों में मुर्दों का मज़हब आप देख रहे हैं , मैने केवल इतना कहा था की दंगों में जान माल की हानि अकेले हिंदुओं की नही हुई थी . अगर गोधरा कांड हुआ तो केंद्र और राज्य दोनो में हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार थी , क्यों नही रोका दंगाइयों को? क्या मजबूरी थी? जब रोक नही सके तो और दंगे भड़का दिए जिससे कि जनता का धार्मिक आधार पर विभाजन हो मतों का ध्रुवीकरण करा कर राजनैतिक फायदा उठाया जा सके.

देशप्रेम का मापदंड किसी की व्यक्तिगत पसंद हो सकता है क्या? यदि हां भाजपा के फिल्मी सितारों को देशद्रोही करार देना चाहिए क्योंकि वे पाकिस्तानी कलाकारों के गानो पर कूल्हे मटका कर नाचते हैं.

खेल में किसी टीम के समर्थन करने भर से आपको उस व्यक्ति के देशप्रेम पर उंगली उठाने का हक नही मिल जाता , आपके तर्क की बुनियाद ही ग़लत है , खेल , खेल है जंग का मैदान नहीं . खेल में खेल भावना दिखाइए , दुर्भावना नहीं.

मैं चाहे आपको दर्जनों उदाहरण दे दूं आपने उन्हें मानना नही है सो नही मानेंगे , वैसे स्वामी अग्निवेश भी कोई अंगूठा छाप तो हैं नहीं , अरुंधती रॉय , अंबेडकर जी कोई मुसलमान तो हैं नहीं , आपने जिन फुले जी का उधारण दिया था उनके अनुयायी भी हिंदू धर्म को तिलांजलि दे चुके हैं क्या वे सब बेवकूफ़ थे?
Sarvesh,चलिए 'इंटर्प्रेटीशन' की बात को भी परख लेते हैं, यदि किसी पेपर का 'इंटर्प्रेटीशन' एक भाषा में करें और उससे हम किसी निष्कर्ष पर पहुचते हैं तो दूसरी भाषा में भी निष्कर्ष वोही होगा!होगा की नहीं और यदि बदलता है तो किसी चमत्कार से कम नहीं होगा!

आप दुबारा दो गलतियों को जोड़ कर एक सही बनाना चाहते हैं आप का तर्क गलत है
आप के शंका करने से क्या होता है १०० वर्षों से लोग शंका ही कर रहे हैं, यदि उनकी शंका का कोई तार्किक आधार होता तो सत्यार्थ प्रकाश पर दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रतिबन्ध लगा दिया होता! अनुवादको का नाम पता ढूंढना कोई कठिन कार्य नहीं है, आप प्रयत्न कर के ढूंढ सकते हैं!

आपने मेरे तर्कों को निरस्त नहीं किया है बस बात को इधर उधर घुमाने का प्रयास किया है कई बार अनुवाद जैसा कुतर्क भी आपने किये हें!

यकीन मानिये मुझे 'भगवा आतंकवाद' के आरोप से कोई आपति नहीं होगी! हाँ यदि मुझे ऐसा लगेगा की कोई घटना सचमुच 'भगवा आतंकवाद' से सम्बंधित है और इन आतंकवादियों ने धार्मिक पुस्तकों से प्रेरणा ली है तो मैं हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी जुटाऊंगा और सही तथ्य मिलने पर हिन्दू धर्म को भी बर्बर और असभ्य कहने से नहीं चुकूँगा!

मैं कहाँ कह रहा हूँ की मेरे मित्र के पूर्वजों से आपको कुछ लेना देना है, मेरे कहने का आशय यह है की भारत और पकिस्तान के अधिकतर लोग भारतीय उपमहाद्वीप के हें परन्तु फिर भी वो अपने आप को विदेशी आक्रान्ताओं की संताने मानते हें, तो इसमें किसी और की गलती नहीं उनकी अपनी गलती

Taufiq,आप पेपर प्रेज़ेंटेशन की तुलना धार्मिक ग्रंथ से कर रहे हैं और मुझे ग़लत ठहरा रहे हैं इस पर क्या कहा जाए? अनुवादकों का नाम पता बताने में क्या दिक्कत है भाई? जब भी किसी पुस्तक में किसी अन्य पुस्तक के अंश लिए जाते हैं तो बकायदा उद्ध्रत सार , पंक्तियों , अध्यायों का वर्णन किया जाता है. समझ नही आता सत्यार्थ प्रकाश में ऐसा क्यों नही किया गया? सत्यार्थ प्रकाश हिंदुओं के केवल एक छोटे संप्रदाय में पढ़ी जाती है जो मूर्तिपूजा को सही नही मानता , करोड़ों हिंदू होंगे जिन्होने सत्यार्थ प्रकाश का नाम तक नही सुना और न ही पढ़ने की आवश्यकता समझते हैं , तो हम क्यों ऐसे ग्रंथ में वर्णित बातों को गंभीरता से लें ?

आपके तर्क निरस्त कर दिए तो आपको कुतर्क ही लगते हैं और श्रीमान मैने कही भी घुमाने की चेष्टा नही की आप पिछले दो दिनों में सूडान , पाकिस्तान , अफ्रीका की यात्रा करा लाए , मैने केवल आपकी कही बातों का जवाब भर दिया है.

आपके जो मान में आए सो कहिए किंतु क्या आप यह आशा करते हैं की आपके तर्कों को श्रद्धालु लोग सुनेंगे ? यदि आप उनके श्रद्धा स्थान पर चोट करेंगे तो मुँह की खाएँगे , और ऐसे में ग़लती आपकी होगी क्योंकि आपने उनको छेड़ा है.

मैने तो यह पढ़ा है की मानव अफ्रीकी महाद्वीप से दुनिया के बाकी देशों में गया है , यहाँ भारत में कुछ लोग स्वयं को चंद्रवंशी सूर्य वंशी , ऋषि मुनियों की संतानें और डेवोन के वंशज बताते हैं इससे कौन सा फ़र्क पड़ता है?
कौन अपना संबंध किससे जोड़ता है इससे कौन सा फ़र्क पड़ना है , पाकिस्तान का पाकिस्तानी अपने को तैमूर बाबर या चंगेज का वंशज बताए तो इससे हमारा क्या जाना है? यह बताने की कृपा करें .

sarvesh,और मैंने भी 'लोगों' शब्द का प्रयोग किया था परन्तु आपने तुरंत उसे 'हिन्दू' समझा किसकी गलती है? मुर्दों का मजहब आप ने देखा या मैंने? आप ये प्रशन कृपया भजपा प्रतिनिधियों से ही पुंचे क्योंकि मैं किसी एक पार्टी को वोट नहीं देता और नहीं उनका प्रवक्ता हूँ.

मैं सिर्फ अपने देश प्रेम की बात कर रहा हूँ, इस सन्दर्भ में मैंने किसी के ऊपर कोई आरोप नहीं लगाया! यदि किसी को शत्रु राष्ट्र की टीम का समर्थन कर के खुसी मिलती है और देश प्रेम आड़े नहीं आता तो मैं लोकतंत्र की भावना के अंतर्गत इसे मान लूँगा किसी और के व्यवहार की जिम्मेवारी मई नहीं ले सकता!

पकिस्तान की टीम यदि भारतीय टीम को हरा देती है तो मुझे सपने में भी ख़ुशी नहीं होगी, अब आप इसे भावना कहें या दुर्भावना क्या फर्क पड़ता है, हाँ सद्भावना दिखाना हमारी परम्परा है जैसे की हमारी सेना नें कारगिल में दिखाया परन्तु बदले में इस्लामिक विचारधारा से प्रेरित पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन कालिया और ६ अन्य सैनिको के शंवो की क्या दुर्दशा की थी, क्योंकि पाकिस्तानियों की नज़र में वो काफ़िर थे और इसी अपमान के हकदार थे!

आप यदि सोचते हैं की कोई व्यक्ति इस लिए किसी बात को स्वीकार कर ले क्योंकि आप चाहते हैं तो क्षमा कीजिये आप स्वस्थ विचार विमर्श की भावना के विपरीत तर्क दे रहे हैं!मैं आप की बात को माने के लिए व्यग्र तो नहीं बैठा था! हिन्दू धर्म छोड़ने वालों का स्वागत है उन सब के पास कोई न कोई वजह है!पर इससे इस्लामिक विचारधारा की निर्शंश्ता कम नहीं हो जाती!


Taufiq,क्षमा करिए किंतु मुर्दों की बातें तो आप ही ने शुरू की थी , आप ही ने मुर्दों का मज़हब देखा था . आपको किसी के धर्म पर उंगली उठाने से पहले यह सोचना चाहिए था कि ४ अन्य उंगलियाँ स्वयं आपकी और इंगित हो रही है , आपने यह नही सोचा तो मैं कैसे ज़िम्मेवार हो गया?

आप अपने देशप्रेम की बातें कीजिए कौन रोकता है , किंतु दूसरे के देशप्रेम पर सवाल तो न करिए , आज की तेज जिंदगी मेंवक़्त किसके पास है मॅच देखने का चाहे जो कोई जिसे हरा दे , इससे हमें क्या मिलने वाला है? खिलाड़ी हैं स्पॉंसेर हैं जीतेंगे तो पैसा कमाएँगे , कौन सा हामरे कल्याण के लिए पैसा खर्च होना है तो कोई हारे या जीते इससे दुनिया तो बदलनी नही है, फिर इस गैर ज़रूरी मुद्दे को इतनी हवा क्यों दिए जा रहे हैं?

आप चाहे हिंदू धर्म को छोड़ने वालों का स्वागत करिए या इस पर छाती पीटीए मुझे इससे कोई सरोकार नही है , मेरा कहना केवल इतना है कि इस्लाम और मुसलमानों को अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से मत देखिए, बस! आगे आपकी मर्ज़ी.
Sarvesh,भाई मेरे दोनों स्तिथियाँ सामान हैं यदि मैं किसी भारतीय विश्वविद्यालय में कोई पेपर हिंदी में प्रेसेंट करता हूँ मान लीजिये न्यूटन के तीसरे नियम पर, तो दुनिया के किसी भी हिस्से में और किसी भी भाषा में ठीक उसी प्रकार पढ़ा और समझा जायेगा जिस प्रकार भारत में, क्या अरबी में अनुवाद करने पर न्यूटन का नियम डार्विन के विकासवाद के सिधांत में बदल जायेगा? नहीं
अनुवाद करने पर मूल सामग्री में केवल २-३% का बदलाव आता है, ये अंतर और भी कम हो सकता है यदि अनुवादन करने वाले की दोनों भाषाओं की प्राकृतिक समझ है. यदि इस २-३% के अंतर को कम भी कर दें तो भी जो मैंने कुरआन और हादिथ में पढ़ा है वो बहुत भयानक ही रहेगा!

मैंने भी आप की कही भर बात का जवाब दिया है, आप ही मुझे दुराग्रही और पूर्वाग्रही साबित करने का असफल प्रयास करते रहे, नहीं कर पाए तो अनुवाद पर ऊँगली उठा दी और अरबी में पढने का सुझाव देने लगे जब वहां भी बात नहीं बनी तो, स्वामी जी की इमानदारी पर संदेह करने लगे जब इसमें भी कामयाबी नहीं मिली तो पश्चिम विरोध पर उतर आये, वहां भी कुछ बात बनती दिखई नहीं दी तो मुझे हिन्दू मान कर हिन्दू धर्म की बुराइयाँ गिनने लगे और अंत में दावा किया की भैया तुम्हारे सारे तर्क निरस्त कर दिए हें
यकीन करो तौफिक भाई, यदि तुमने मेरे सारे तर्क निरस्त कर दिए होते तो मैंने अपनी गलती मान ली होती और चुपचाप यहाँ से चला गया होता, परन्तु मुझे निराशा है की आप ने अनुवाद का बहाना बना कर मेरे इस विश्वास को की इस्लाम मानवता विरोधी विचारधारा है को और पुख्ता कर दिया है मुझे भी दो भाषाओं का थोडा बहुत ज्ञान है पर अनुवाद की ये समस्या इतनी विकराल नहीं है की अहिन्स का अनुवाद हिंसा में हो जाये!

कोई पुस्तक ज्यादा पढ़ी जाती है इससे ये साबित नहीं होता की वो सही है सत्यार्थ प्रकाश कम पढ़ी जाती है इससे ये भी साबित नहीं होता की ये पुस्तक गलत है
मैंने सिर्फ पकिस्तान के लोगों की बात नहीं की भारतीय(अधिकतर मुस्लिम ) लोग भी अपने आप को इन्ही आक्रान्ताओं का वंशज बताते हें और तब इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है की वो राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ करने लग जाएँ!

आप भी मुझे क्षमा करें और बताएं की मैंने किस पोस्ट में मरने वालों का मजहब देखा, जहाँ तक मरने का सवाल है तो मैं बता दूँ की इस्लाम मौत बाँटने मैं कोई ख़ास भेदभाव नहीं करता दुनिया भर में पिछले १४०० वर्षों से और अभी तक इस्लाम ने प्रतेक जगह मौत को बड़े उत्साह पूर्वक बांटा है, इस्लामिक देश तो इससे सबसे अधिक पीड़ित हें

जी नहीं मैं एक लोकतान्त्रिक देश में रहता हूँ और यदि मुझे कोई बात गलत लगती है तो मैं तुरंत उसपर आवाज़ उठाऊंगा, इस बात से बिलकुल नहीं डरूंगा की ४ उँगलियाँ मेरी तरफ उठ रही हें हाँ मैं उन उँगलियों के उठने का कारन जरूर जानना चाहूँगा! क्या हम किसी परिवर्तन की आशा श्रधालुओं की श्रधा का सम्मान करके कर सकते हें हरगिज नहीं चाहे वो श्रध्हालू कितने ही खतरनाक क्यूँ न हों परिवर्तन चाहते हें तो इस सीमा को लांघने का खतरा तो उठाना ही पड़ेगा!

चलिए वैसे मैं ये बात कई बार कह चूका हूँ पर आपकी तसल्ली के लिए एक बार और कह देता हूँ मुझे सिर्फ अपने देशप्रेम से मतलब है और किसी के नहीं! क्रिकेट का मुद्दा आप का उठाया हुआ है मेरा नहीं!पर चलिए बात चली है तो बता चलूँ की मेरे देश का प्रतिनिधित्वा करने वाली टीम शत्रु राष्ट्र की टीम से हार जाती है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, भले ही मुझे धेला भी न मिले पर यदि ओलम्पिक में हमारे एथलीट पदक नहीं जीत पाते तो मुझे उतनी ही निराशा होती है जितनी की आपको, मैं अपने राष्ट्र के मान सम्मान से अपने आप को उतना ही गौरवान्वित महसूस करता हूँ जितना की आप!

आप की प्रतिक्रिया से लग रहा है आप क्रोधित हो गएँ हैं, मुझे किसी के धर्म में आने जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, मैंने मुसलमानों के प्रति किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर कुछ भी नहीं कहा, इस्लाम के बारे में मेरे विचार किंचित भी नहीं बदले हैं

आपने अपना कीमती समय इस विचार विमर्श को दिया उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.
धन्यवाद,

( 2 Votes )
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Comments (2)Add Comment
Cuckoo
...
written by Cuckoo , July 10, 2010
respected Sarvesh I will be greatful to you if u will use Roman Script. I tried to translate it on google. but all in devils veins.

aapko bhasha koi ho aap keval ise ROAMN Script mien agar convert ker de tho main aapka abhari rahaunga.

thanks in advance. - cuckoo
Johnathan Harrell
somewhere else too?
written by Johnathan Harrell , July 02, 2010
Have you wrote it some where else too?

Actually I'm working on a translation system.

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